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आज भी लोगो की जुबां पर है शशि कपूर का ये फेमस डायलॉग

Sanjeevni Today 05-12-2017 12:35:25

मुंबई। अपने दौर के जाने माने सबसे हैंडसम अभिनेता शशि कपूर के निधन के बाद पूरे बॉलीवुड में शोक की लहर छाई हुई है। शशि कपूर को साल 2014 से चेस्ट में तकलीफ थी। इससे पहले उनकी बायपास सर्जरी भी हुई थी। शशि बाबू के फिल्मी डायलॉग्स असल जिंदगी में भी हमें जीने का तरीका सिखाते हैं।

 

      

सदाबहार अभिनेता शशि कपूर भले ही हमारे बीच न रहे हों। लेकिन, उनकी यादें हमेशा बनी रहेंगी। शशि कपूर ने 60, 70 और 80 के दशक में फिल्मी पर्दे पर जो जलवा बिखेरा वैसा अब कहीं देखने को नहीं मिलता। वे उस दौर में एक साथ छह से सात फिल्मों में काम किया करते थे। शशि कपूर एक दिन में छह शिफ्ट में काम करते थे. उस वक्त उनसे मिलना तक मुश्किल हो जाता था।

शि कपूर ने 60 के दशक में डेब्यू किया था जो सक्सेसफुल रहा। इस दौरान उन्होंने करीब 116 हिंदी फिल्में कीं। इसी दशक में उन्हें काम मिलना बंद हो गया। काम ना होने की वजह से शशि कपूर मायूस हो गये। घर चलाने के लिए उन्हें लिए पैसों की जरूरत थी।

पेसो की कमी के कारण उन्हें अपनी स्पोर्ट्स कार बेचनी पड़ी। पति का सहारा बनने और घर परिवार को संभालने के लिए उनकी पत्नी जेनिफर केंडल को सामान बेचना पड़ा। फिर भी उन्होंने हर नहीं मानी इसके बाद 70 के दशक में शशि कपूर एक ऐसा सितारा बनकर चमके जिसकी चमक के आगे बाकी सितारे भी फीके लगने लगे।

जेनिफर कैंडल से की शादी 
1956 में कोलकाता में उनकी मुलाकात हुई ब्रिटिश एक्ट्रेस जेनिफर कैंडल से मिलते ही शशि कपूर को पहली नजर में ही प्यार हो गया। 1958 में मात्र 20 साल की उम्र में उन्होंने जेनीफर से शादी कर ली। इन दोनों के तीन बच्चे हैं- कुणाल कपूर, करण कपूर और संजना कपूर। कुणाल कपूर ने 1978 में फिल्म ‘जुनून’ में एक छोटी सी भूमिका निभाई थी।

एक्टिंग के बाद उन्होंने डायरेक्शन और प्रोडक्शन का काम शुरू किया। शशि कपूर के दूसरे बेटे करन 80 के दशक में एक सफल मॉडल थे. वे ‘बॉम्बे डाइंग’ के लिए मॉडलिंग कर चुके हैं। वे अपनी पत्नी और बच्चों के साथ लंदन में रहते हैं और सफल फोटोग्राफर हैं। उनकी बेटी संजना कपूर परिवार की पहली लड़की थीं, जिसने फिल्मों में काम किया।1981 में फिल्म '36 चौरंगी लेन' से उन्होंने अभिनय की शुरूआत की थी। 
  
जेनिफर के लिए शबाना से खत्म किया था रिश्ता 
जुनून फिल्म में शशि कपूर की पत्नी जेनिफर और उनकी लोकप्रिय जोड़ीदार शबाना आजमी दोनों ही थीं। यह फिल्म कई मायनों में ऐतिहासिक थी। इसके बाद 1976 में उन्होंने शबाना के साथ फकीरा जैसी हिट फिल्म दी। इस फिल्म के बाद शबाना और शशि कपूर की जोड़ी इतनी मशहूर हो गई कि उन्होंने कोई आधा दर्जन फिल्में एक साथ की थीं।


शबाना के साथ शशि कपूर की दोस्ती की वजह से उनके करियर जिंदगी में खलबली मच गयी थी। यह इस कदर बढ़ गयी थी कि शशिकपूर को इसे छुपाने के लिए यह मानना पड़ा कि जब तक जेनिफर जिंदा रहेंगी तब तक उनका शबाना से किसी तरह का रिश्ता नहीं रहेगा। 

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जिंदगी से जुड़ी शशि कपूर के 10 डायलॉग्स 
ख्वाब जिंदगी से कई ज्यादा खूबसूरत होते हैं (सत्यम शिवम सुंदरम)
दुनिया एक थर्ड क्लास का डिब्बा बन गयी है, जगह बहुत कम है, मुसाफिर ज्यादा (दीवार)

ये मत सोचो कि देश तुम्हें क्या देता है...सोचो ये कि तुम देश को क्या दे सकते हो (रोटी कपड़ा और मकान)
ये प्रेम रोग है...शुरू में दुख देता है...बाद में बहुत दुख देता है (नमक हलाल)
हम गायब होने वालों में से नहीं है..जहां-जहां से गुजरते हैं जलवे दिखाते हैं...दोस्त तो क्या, दुश्मन भी याद रखते है (सिलसिला)
ज्यादा पैसा आये तो नींद नहीं आती...नींद आए तो ज्यादा पैसा नहीं आता (दीवार) 
इस दुनिया में आदमी इंसान बन जाये...तो बहुत बड़ी बात है (कभी-कभी)

अमिताभ के साथ शानदार जोड़ी 
सदी के महानायक अमिताभ बच्चन के साथ इनकी जोड़ी खूब सराही गयी थी। 'दीवार', 'नमक हलाल' 'सुहाग' और 'त्रिशूल' उनकी सुपरहिट फिल्में रही हैं. फिल्म दीवार में उनका डायलॉग 'मेरे पास मां है' आज भी लोगों की जुबान पर है।

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रुपहले पर्दे पर शशि कपूर का सफर
मशहूर अभिनेता शशि कपूर ने बचपन से ही फिल्‍मों में काम करना शुरू कर दिया था। 1940 के दशक में कई धार्मिक फिल्मों में उन्होंने काम किया। बाल कलाकार के रूप में उनकी सबसे यादगार फिल्मे है। 'आग' (1948) और 'आवारा' (1951)। इन दोनों ही फिल्मों में उन्होंने अपने बड़े भाई राजकूपर के बचपन का किरदार निभाया था। शशि कपूर ने 1961 में यश चोपड़ा की फिल्म 'धर्मपुत्र' से बड़े पर्दे पर बतौर हीरो कदम रखा।

इसके बाद उन्होंनेे बॉलीवुड को 'वक्त' (1965), 'जब-जब फूल खिले' (1965), 'रोटी कपड़ा और मकान' (1974), 'दीवार' (1975), 'सत्यम शिवम सुंदरम' (1978), 'काला पत्थर' (1979), 'सुहाग' (1979), 'शान' (1980), 'क्रांति' (1981) और 'नमक हलाल' (1982) जैसी सुपर हिट फिल्में  दीं. उन्होंने कुल 116 फिल्मों में अभिनय किया था। 

2015 में मिला था दादा साहेब फाल्के पुरस्कार
हिंदी सिनेमा में उनके योगदान को देखते हुए 2015 में उन्हें दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से नवाजा गया। पृथ्वीराज कपूर व राज कपूर के बाद वह कपूर परिवार के तीसरे सदस्य हैं जिन्हें ये पुरस्कार मिला है।
1979 - जुनून के लिए बतौर निर्माता सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार 
1986 - न्यू दिल्ली टाइम्स के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार
1994 - राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार - विशेष ज्यूरी पुरस्कार मुहाफिज के लिए
2010 - फिल्मफेयर लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड
2011 - पद्मभूषण सम्मान 
2015 - दादासाहेब फाल्के पुरस्कार

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