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बाबरी विध्वंस: 6 दिसंबर 1992 का दिन इतिहास का काला दिन, पत्रकार मार्क टली ने बताई जुबानी कहानी...

Sanjeevni Today 05-12-2017 22:40:35

नई दिल्ली। 6 दिसंबर, 1992 का दिन इतिहास का काला दिन बन गया, आज ही के दिन अयोध्या में बाबरी की साजिश को अंजाम दिया गया था। इस दौरान पत्रकार भी निशाने पर थे। बाबरी विध्वंस का रिहर्सल 5 दिसंबर को ही हो गया था। 5 दिसंबर को एक बड़े से पत्थर को बांधकर पहाड़ से नीचे गिराया गया। इसी दिन अयोध्या में लाखों कारसेवक एक और नारा बार-बार लगा रहे थे। मिट्टी नहीं सरकाएंगे, ढांचा तोड़ कर जाएंगे। ये तैयारी एक दिन पहले की थी। 

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भगवा ब्रिगेड ने अगले दिन 12 बजे का वक्त तय किया था कारसेवा शुरू करने का। एक अजीब का जोश सबसे चेहरे पर साफ देखा जा सकता था। उस रोज 1,50,000 लोगों की एक हिंसक रैली के दंगा में बदल जाने से यह विध्वस्त हो गयी। मुंबई और दिल्ली सहित कई प्रमुख भारतीय शहरों में इसके फलस्वरूप हुए दंगों में 2,000 से अधिक लोग मारे गये। यही नहीं लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहने जाने वाली मीडिया भी इस हिंसा की आग से नहीं बच  पाई। 

    


6 दिसंबर 1992 का दिन भी कुछ ऐसा ही है, आज यह लड़ाई लड़ी जा रही है कि राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद की विवादास्पद 2.77 एकड़ भूमि पर मालिकाना हक किसका है। हालांकि 30 सितंबर 2010 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस भूमि को हिंदू, मुसलमान और निर्मोही अखाड़े में बांटने का फैसला सुनाया था लेकिन इस फैसले से कोई भी पक्ष खुश नहीं था और अब मामला सर्वोच्च न्यायालय में है।

छह दिसंबर को बाबरी मस्जिद विध्वंस की बरसी को लेकर आइबी ने देश के सभी महत्वपूर्ण रेलवे स्टेशनों को हाइअलर्ट पर रखा है। बिहार में कटिहार रेल मंडल के कटिहार रेलवे स्टेशन व किशनगंज रेलवे स्टेशन को बम से उड़ा देने की धमकी की सूचना पर आइबी ने कटिहार रेलवे स्टेशन को हाइअलर्ट कर दिया है। पटना मुख्यालय से हाइअलर्ट की सूचना पर सोमवार से ही रेल प्रशासन में हड़कंप मच गया। 


बाबरी मस्जिद में जब क़रीब डेढ़ लाख लोग मौजूद थे जो भाजपा और विश्व हिंदू परिषद के नेताओं के भाषण सुन रहे थे। वहां मौजूद नेताओं में लाल कृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी भी शामिल थे। जब हम खड़े थे उसके ठीक नीचे सिर पर चमकीली पीले वस्त्र बांधे कुछ नौजवानों ने बैरियर को लांघ कर मस्जिद की ओर बढ़ने की कोशिश की और सारा मामला तभी शुरू हुआ। पुलिसकर्मी खड़े रहे और देखते रहे, हालांकि आयोजनकर्ताओं द्वारा भीड़ को नियंत्रित करने के लिए नियुक्त किए गए सिर पर भगवा वस्त्र बांधे कुछ लोगों ने उन्हें रोकने की कोशिश ज़रूर की थी। 

इसके बाद इस भीड़ ने टेलीविज़न के लिए काम करने वाले पत्रकारों से कैमरे छीन लिए और उन्हें तोड़ डाला। इस घटना से आसपास के पेड़ों पर चढ़े युवक उत्साहित हो गए और उन्होंने सभी बाड़ों को तोड़ दिया और मस्जिद की ओर बढ़ने लगे। भीड़ के इस सैलाब को देखकर मस्जिद के पास जो थोड़े-बहुत पुलिसकर्मी खड़े थे, वे भी पीछे हटने लगे। भीड़ इन पुलिसकर्मियों पर पत्थर बरसाने लगी और वे पत्थरों से बचने की कोशिश करते हुए पीछे हटे। तभी दो नौजवान मस्जिद की बीच वाले गुंबद पर चढ़ गए और इसे तोड़ने लगे। 

इसके बाद गुबंदों पर कई लोग चढ़ गए, BBC ने सबसे पहले तोड़फोड़ की खबर दी थी। क्योंकि अयोध्या से टेलीफ़ोन लाइनें काट दी गई थीं इसलिए BBC के लिए अपनी ख़बर देने के लिए मैं गाड़ी से फ़ैज़ाबाद गया। वहां से ख़बर देने के बाद जब मैं वापस अयोध्या आया तो मुझे और मेरे साथ मौजूद हिंदी के कुछ पत्रकारों को पहले तो कारसेवकों ने धमकाया और बाद में हमें एक कमरे में बंद कर दिया। हमें उस कमरे में कई घंटों तक बंद करके रखा गया था। 

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बाद में अयोध्या के जाने-माने मंदिरों में से एक के प्रमुख पुजारी एक स्थानीय अधिकारी के साथ हमें छुड़ाने आए। जब हम बाहर आए तब हमने देखा कि बाबरी मस्जिद पूरी तरह से ध्वस्त हो चुकी थी। मार्क टली भारत की बीते बीस-तीस बरसों की बड़ी घटनाओं के वे गवाह रहे हैं। चाहे अयोध्या में विवादित ढांचे को ध्वस्त किया जाना हो या इससे पहले स्वर्ण मंदिर में सैन्य कार्रवाई। 

 

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