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यहां संतान की प्राप्ति के लिए शिवलिंग पर चढ़ाया जाता है खीरा

Sanjeevni Today 20-06-2017 14:24:07

रायपुर। आज आपको एक प्राचीन देवालय के बारे में बताने जा रहे है। छत्तीसगढ के बस्तर में घने जंगलों और दुर्गम पहाड पर प्राचीन धार्मिक परंपराओं की खूबसूरती को दर्शाता है। प्राचीन धार्मिक धरोहरों में एक सुप्रसिद्ध नाम कोंडागांव जिले के आलोर ग्राम स्थित पहाड के शीर्ष पर गुफा के अंदर मौजूद प्राकृतिक शिवलिंग है। जिसका दर्शन साल में केवल एक बार किया जा सकता है, साल में एक बार भक्तों को दर्शन देकर ये माता उनकी मुरादें पूरी करतीं हैं। 

 

फरसगांव ब्लॉक के ब़डे डोंगर क्षेत्र की गुफा में मौजूद लिंगेशवरी माता को शिव और शक्ति का समन्वित रूप माना जाता है। साल भर इस गुफा का प्रवेश द्वार बंद रहता है और हर साल भाद्र महीने के शुक्ल पक्ष में नवमी तिथि के बाद आने वाले बुधवार को एक दिन के लिए क्षेत्रीय बैगा दैविक विधी-विधान के साथ इस गुफा का द्वार खोलते हैं। क्षेत्रवासियों के मुताबिक, ये पत्थर शिव-पार्वती के अर्धनारिश्वर स्वरूप का परिचायक है। 

इसलिए इसे केवल शिवलिंग नहीं, बल्कि लिंगेश्वरी माई के नाम से भी पूजा जाता है। एक ग्रामीण के मुताबिक, नि: संतान दंपत्ति यहां पहुंचकर संतान की कामना करते हैं और माता उनकी इच्छा पूरी करती है। यहां मन्नत मांगने का तरीका भी अनोखा है, प्रचलन के मुताबिक, संतान इच्छुक दंपत्ति यहां माता के चरणों मे खीरा यानि ककडी चढाते हैं और चढे हुए खीरे को पुजारियों के द्वारा वापस लौटाने के बाद पति-पत्नी खीरे को अपने नाखून से चीरकर देव स्थल के समीप ही खाते हैं।

जिससे जल्द उन्हें संतान का सुख प्राप्त हो जाता है। एक अनोखी बात ये भी है कि जब इस गुफा का पट खोला जाता है तो हर साल शिवलिंग के सामने रखे रेत में किसी न किसी जीव जंतु का पद चिन्ह रेत में बना मिलता है और ये पद चिन्ह क्षेत्र के आगामी हालात का पुर्वानुमान कराते हैं। अगर रेत में बिल्ली के पांव के निसान मिले तो क्षेत्र में भय का महौल रहेगा, इसी तरह बाघ के पैरों के निशान मिले तो क्षेत्र में जंगली जानवरों का आतंक का पूर्वानुमान लागाया जाता है। मुर्गी के के पैरों के निशान अकाल के सुचक हैं तो घोडे के पैरों के निशान युद्द और कलह का प्रतीक हैं।

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