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एक ऐसा मंदिर जहां नहीं होती कोई भी पूजा-पाठ, जानिए पूरी कहानी

Sanjeevni Today 20-06-2017 13:45:59

रायपुर। लोग अपनी मन्नत मांगने मंदिर जाते है और वहां पूजा-पाठ करते है। लेकिन आज आपको एक ऐसे मंदिर के बारे में बता रहे है जो महानदी किनारे पर स्थित है और इस मंदिर में कोई भी पूजा-पाठ नहीं करता। यह मंदिर छत्तीसगढ नारायणपुर जिला मुख्यालस से महज 40 किलोमीटर दूर महानदी के तट पर है। नारायणपुर गांव का ऐतिहासिक शिव मंदिर उपेक्षा का शिकार है। कहने को तो मंदिर की देखभाल का जिम्मा भारतीय पुरातत्व विभाग का है, लेकिन इसके बावजूद मंदिर की देखभाल उचित तरीके से नहीं हो रही है। ऐसे में 6वीं शताब्दी में निर्मित इस पूर्वाभिमुख प्राचीन शिव मंदिर के अस्तित्व पर खतरा पैदा हो गया है। अपने आप में ये मंदिर कई रहस्यों को छुपाए हुए है। 

 

कभी था बौद्ध विहार

स्थानीय लोग बताते हैं कि कभी इस मंदिर को बौद्ध विहार माना जाता था, लेकिन काफी जांच-पडताल और शोध के बाद पता चला कि ये शिव मंदिर है। 

प्रचलित है विचित्र जनश्रुति

मंदिर बनाने वाले कारीगर को लेकर इलाके में विचित्र तरह की जनश्रूति प्रचलित है। कहते हैं कि इसे बनाने वाला कारीगर नंगे बदन इसके पत्थरों की तराशी का काम करता था। दोनों समय उसकी पत्नी ही खाना लेकर आती थी। संयोग से एक दिन उसकी बहन खाना लेकर आई और अपने कारीगर भाई को नंगे देख शर्म से पानी-पानी हो गई। इसी तरह बहन की स्थिति देख उस कारीगर से शर्म के मारे रहा नहीं गया और उसने मंदिर से कूदकर जान दे दी। भाई के मरने पर बहन ने भी प्राण त्याग दिए। मंदिर के समीप दो पाषाण की शिला पडी है, जिसके बारे में कहा जाता है कि वो उस कारीगर और उसकी बहन की हैं। 

कोई नहीं होता है पूजा-पाठ
सिरपुर कालीन इस प्राचीन मंदिर में पूजा-पाठ भी नहीं होता। इसकी वजह है कि निर्धारित समयावधि में इसका निर्माण पूरा नहीं हो पाया था। दरअसल मंदिर बनाने वाले कारीगर की बीच में ही मृत्यु हो जाने के चलते मंदिर भी अधूरा रह गया। 

पत्थरों का है पूरा मंदिर
मंदिर एक कोण में महानदी के किनारे स्थित है। इसमें सुंदर नक्काशी और भित्ती चित्र उकेरे गए हैं। पूरा मंदिर पत्थरों से निर्मित है। साथ ही विभिन्न प्रकार की मूर्तियां दीवारों पर बनी हुई हैं। पुरातत्व विभाग ने इसे चारो तरफ से लोहे के ग्रिल से घेर दिया है, ताकि ये सुरक्षित रहे। बावजूद इसके महानदी के बाढ के थपेडों ने इसका काफी नुकसान पहुंचाया है।

क्या है ग्रामीणों की मांग
ग्रामीणों ने इसे पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने की मांग की है। कभी बौद्ध विहार के रूप में चर्चित रहे इस मंदिर के आसपास अब छोटी सी आदिवासी आबादी विकसित हो गई है, लेकिन वहां तक पहुंचने के लिए अभी भी पक्की सडक नहीं है। गांव वाले कहते हैं कि सरकार यदि इसे पर्यटन से जोड दे तो नारायणपुर का ये प्राचीन मंदिर भी विश्व मानचित्र पर जगह पा सकता है।

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