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एक ऐसा मंदिर जहां की जाती है व्हेल मछली की पूजा
sanjeevnitoday.com | Monday, July 17, 2017 | 11:58:38 AM
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नई दिल्ली। आप सब ने भारत में भगवान के कई तरह के मंदिर देखे होंगे, लेकिन शायद आप ने आजतक एक ऐसे मंदिर के बारे में नहीं सुना होगा जहां व्हेल मछली की पूजा की जाती है। इस मंदिर को "मत्स्य माताजी" के नाम से जाना जाता है। यह मंदिर गुजरात में वलसाड तहसील के मगोद डुंगरी गांव में स्थित है। यह मंदिर लगभग 300 साल पुराना है, जिसका निर्माण मछुआरों ने करवाया था। मछली पकडने के लिए समुद्र में जाने से पहले यहां रहने वाले मछुआरे इसी मंदिर में पूजा करते हैं। प्रतिवर्ष नवरात्रि की अष्टमी पर यहां विशाल मेला भी भरता है। 

 

मंदिर से जुडी प्राचीन कथा कुछ यूं है कि लगभग 300 वर्ष पहले यहां रहने वाले प्रभु टंडेल नामक व्यक्ति को एक सपना आया था। टंडेल ने सपने में देखा कि समुद्र किनारे एक व्हेल मछली मृत अवस्था में है। जब उसने सुबह जाकर देखा तो सचमुच में एक मृत व्हेल मछली समुद्र किनारे पडी हुई थी। यह एक विशाल आकार की मछली थी, जिसे देखकर ग्रामीण चौंक उठे थे। टंडेल ने स्वप्न में यह भी देखा था कि देवी मां व्हेल मछली का रूप धरकर तैरते हुए किनारे पर आती हैं। लेकिन किनारे पर आते ही उनकी मौत हो जाती है। यह बात टंडेल ने ग्रामीणों से बताई और व्हेल को दैवीय अवतार मानकर गांव में एक मंदिर का निर्माण करवाया।

मंदिर के निर्माण से पहले टंडेल ने किनारे ही व्हेल को मिट्टी में दफना दिया था। मंदिर का निर्माण हो जाने के बाद उसने व्हेल की हडि्डयां निकाली और उसे मंदिर में स्थापित कर दिया। व्हेल की हडि्डयों की स्थापना के बाद से वह और कुछ अन्य ग्रामीण नियमित यहां पूजा-अर्चना करने लगे। हालांकि कुछ ग्रामीण टंडेल के इस विश्वास के खिलाफ भी थे। उन्होंने न तो मंदिर निर्माण में उसका साथ दिया और न ही पूजा-अर्चना की। कई बार आपने सुना होगा कि दैवीय शक्ति में विश्वास न करने या उसका मजाक उडाने का परिणाम भी भुगतना पडता है।

कुछ ऐसा ही उन ग्रामीणों के साथ भी हुआ। कुछ दिनों बाद ही गांव में भयंकर बीमारी फैल गई। टंडेल के कहने पर लोगों ने इसी मंदिर में मन्नत मांगी कि वे उन्हें माफ कर दें और गांव को रोग से मुक्त कर दें। यह चमत्कार ही था कि पीडित लोग अपने आप ठीक होने लगे। इसके बाद से ही पूरे गांव को इस मंदिर में विश्वास हो गया और वे रोजाना पूजा-अर्चना करने लगे। तब से लेकर आज तक यह प्रथा कायम है कि गांव का हरेक ग्रामीण समुद्र में उतरने से पहले इस मंदिर के दर्शन करता है।

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